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Mahashivratri Vrat 2022 in hindi – महाशिवरात्रि व्रत विधि
Astrology / By Dr. Deepak Sharma
Mahashivratri Vrat 2022 in hindi – महाशिवरात्रि व्रत विधि । महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) दिनांक 1 मार्च 2022, दिन मंगलवार को है। शिवरात्रि पर्व फाल्गुण मास, कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रत्येक वर्ष प्रायः सम्पूर्ण  भारत में मनाया जाता है।  महाशिवरात्रि व्रत शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस व्रत को सभी वर्ग, समुदाय तथा  वृ्द्ध, स्त्री, पुरुष और बालक सभी कर सकते है। भगवान शिव लोक में शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) के दिन भगवान शिवलिंग के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में शिव भक्त शिव मन्दिर में आकर जल चढ़ाते है। भारत ही नहीं भारत देश से इतर सभी शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि के दिन बेल,बेलपत्र ,धतूरा धतूरा का पत्ता और दूध से अभिषेक किया जाता है।
महाशिवरात्रि मुहूर्त 2022
महाशिवरात्रि  – 1 मार्च 2022
चतुर्दशी तिथि आरंभ- 03:18 प्रातः (1 मार्च)
चतुर्दशी तिथि समाप्त- 1:03 प्रातः (2 मार्च)
पारण का समय- 06:36 से 15:32 (2 मार्च )
शिवरात्रि एक महोत्सव है यह महोत्सव इसलिए है कि जिस प्रकार आज हमलोग मैरिज डे मनाते है और लाखो खर्च करके अपनी खुशिया लोगो तथा अपने परिवार के साथ शेयर करते है उसी प्रकार फाल्गुण मास, कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को ही देवों के देव भगवान भोलेनाथ का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। इसी कारण कहा जाता है की इस दिन अविवाहित लड़की-लड़का यदि सच्चे मन से महादेव की पूजा करते हैं तो वे  इच्छित वर प्राप्त करते है। विवाहित स्त्री-पुरुष यदि व्रत करते है तो पारिवारिक सुख-शांति मिलती है।अतः हमलोगो का कर्तव्य बनता है कि इस महापर्व को महोत्सव के रुप में मनाये।
पढ़े ! 16 सोमवारी व्रत और सोमवार व्रत में क्या है अन्तर
महाशिवरात्रि व्रत का फल ( Result of Mahashivratri Vrat)
महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) करने से शिव भक्तो को  सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति में आत्मबल सुदृढ़ होता है परिणामस्वरूप कार्य क्षमता बढ़ता है और शीघ्र ही अपने लक्षित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है अब आप इसे भोलेनाथ का आशीर्वाद समझे या अपने परिश्रम पर घमंड करे यह तो आपके ऊपर निर्भर करता है।
शिवरात्रि व्रत करने से  भक्तो का सभी क्षेत्रो में कल्याण होता है सभी प्रकार के दु:ख, पीडाओं का अंत होता है और शीघ्र ही इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। इस व्रत को करने से धन-धान्य की वृद्धि, सुख-सौभाग्य तथा समृ्द्धि की प्राप्ति होती है। जो भी भक्त प्रेम पूर्वक तन-मन-धन से  इस व्रत को करते है उसके सभी मनोकामनाए शीघ्र ही महादेव की कृपा से पूर्ण होते है।
महादेव और उनका स्वरूप
देवों के देव महादेव सच्चिदानन्द (सत+चित+आनंद ) स्वरूप है इनकी पूजा शुद्ध चित्त से ही करनी चाहिए अन्यथा पूजा का पूर्ण लाभ नहीं मिलेगा। महादेव शिव लोक में “सत्यं शिवं सुन्दरम्” अर्थात शिव ही तो सत्य है और जो सत्य है वही सुन्दर है के रूप में प्रतिष्ठित है।  शिव मृत्युदाता और मृत्यु रक्षक दोनों रूप में हैं।
इसका मुख्य कारण है कि शिव में ही जन्म और मृत्यु दोनों समाहित है यथा — यदि  “शिव” शब्द से “इकार” को निकाल दिया जाता है तो शेष बचता है “शव” लोक में जब शरीर से प्राण निकल जाता है तब मनुष्य का वही  शरीर “शव” के रूप में परिवर्तित हो जाता है तब कहा जाता है अमुक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। “ई” इकार शब्द ईश्वर वा प्राण का वाचक है और जैसे ही “शव” से “इकार” का सम्पर्क होता है तो  वह शिव रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है जो जीवन और मरण से परे है।
महादेव ऐसे देव है जहा सबको न्याय मिलता है। न्याय के देवता (God of Justice) के रूप में भी प्रतिष्ठित है और इनका आशीर्वाद अंतिम होता है इसमें किन्तु परन्तु नामक कोई चीज नहीं आती है। आज का सुप्रीमकोर्ट (Superime court) अंशतः ऐसा ही है। महादेव के अनेक नाम है उनमे एक नाम नीलकण्ठ भी है, विषपान करने से इनका कंठ नीला हो गया था। इसी कारण इनका नाम नीलकंठ पड़ा। भगवान भोलेनाथ का व्रत करने से व्यक्ति कि  धनलिप्सा, लोभ, मोह, द्वेष  आदि से मुक्ति मिलती है। सद बुद्धि का विकास होता है  और जीवन सात्विक कार्यो की ओर प्रेरित होता है।
महादेव शिवजी के 108 नाम
महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) के दिन महादेव शिवजी के पूजा करते समय यदि इनके 108 नामो का भी जप करना चाहिए इनके १०८ नाम सर्वसुख प्रदान करने वाला होता है। महादेव के नाम का जप करने मात्र से सभी प्रकार के दुखो से छुटकारा मिल जाता है। देवो के देव महादेव के १०८ नाम निम्नलिखित है।
  1. शिव – कल्याण स्वरूप, जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति देने वाले
  2. महेश्वर – माया के अधीश्वर
  3. शम्भू – आनंद स्वरूप
  4. पिनाकी – पिनाक धनुषधारी
  5. शशिशेखर – सिर पर चंद्र धारण करने वाले
  6. वामदेव – अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  7. विरूपाक्ष – भौंडी नेत्र वाले
  8. कपर्दी –  जटाजूटधारी
  9. नीललोहित – नीले और लाल रंग वाले
  10. शंकर – सर्व कल्याणकारी
  11. शूलपाणी – हाथ में त्रिशूलधारी
  12. खटवांगी – खटिया का एक पाया रखने वाले
  13. विष्णुवल्लभ – भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
  14. शिपिविष्ट – सितुहा में प्रवेश करने वाले
  15. अंबिकानाथ – भगवती पति
  16. श्रीकण्ठ – सुंदर कण्ठ वाले
  17. भक्तवत्सल – भक्तों को स्नेह करने वाले
  18. भव – विश्व रूप में  स्थित
  19. शर्व – कष्टों हरण कर्ता
  20. त्रिलोकेश – तीनों लोकों के स्वामी
  21. शितिकण्ठ – सफेद कण्ठ वाले
  22. शिवाप्रिय – पार्वती प्रिय
  23. उग्र – अत्यंत उग्र रूपधारी
  24. कपाली – कपाल धारण करने वाले
  25. कामारी – कामदेव के शत्रु
  26. अंधकारसुरसूदन – अंधक दैत्य हन्ता
  27. गंगाधर – गंगाजी को धारण करने वाले
  28. ललाटाक्ष – ललाट में आँख वाले
  29. कालकाल – काल के भी काल
  30. कृपानिधि – करूणा की खान
  31. भीम – भयंकर रूप वाले
  32. परशुहस्त – हाथ में फरसा धारण करने वाले
  33. मृगपाणी – हाथ में हिरण धारण करने वाले
  34. जटाधर – जटाधारी
  35. कैलाशवासी – कैलाश के निवास करने वाले
  36. कवची – कवचधारी
  37. कठोर – अत्यन्त मजबूत  शरीर वाले
  38. त्रिपुरांतक – त्रिपुरासुर वध करने वाले
  39. वृषांक – बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
  40. वृषभारूढ़ – बैल की सवारी वाले
  41. भस्मोद्धूलितविग्रह – शरीर में भस्म लगाने वाले
  42. सामप्रिय – सामगान से प्रेम करने वाले
  43. स्वरमयी – सातों स्वरों में निवास करने वाले
  44. त्रयीमूर्ति – वेदरूपी विग्रह करने वाले
  45. अनीश्वर – जिसका और कोई मालिक नहीं है
  46. सर्वज्ञ – सब कुछ जानने वाले
  47. परमात्मा – सबका अपना आपा
  48. सोमसूर्याग्निलोचन – चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी नेत्र वाले
  49. हवि – आहूति रूपी द्रव्य वाले
  50. यज्ञमय – यज्ञस्वरूप वाले
  51. सोम – उमा के सहित रूप वाले
  52. पंचवक्त्र – पांच मुख वाले
  53. सदाशिव – नित्य कल्याण  स्वरूप
  54. विश्वेश्वर – सारे विश्व के ईश्वर
  55. वीरभद्र – बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
  56. गणनाथ – गणों के स्वामी
  57. प्रजापति – प्रजाओं का पालन करने वाले
  58. हिरण्यरेता – स्वर्ण तेज वाले
  59. दुर्धुर्ष – किसी से नहीं दबने वाले
  60. गिरीश – पहाड़ों के मालिक
  61. गिरिश – कैलाश पर्वत पर सोने वाले
  62. अनघ – पापरहित
  63. भुजंगभूषण – साँप के आभूषण वाले
  64. भर्ग – पापों को भूंज देने वाले
  65. गिरिधन्वा – मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  66. गिरिप्रिय – पर्वत प्रेमी
  67. कृत्तिवासा – गजचर्म पहनने वाले
  68. पुराराति – पुरों का नाश करने वाले
  69. भगवान् – सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
  70. प्रमथाधिप – प्रमथगणों के अधिपति
  71. मृत्युंजय – मृत्यु को जीतने वाले
  72. सूक्ष्मतनु – सूक्ष्म शरीर वाले
  73. जगद्व्यापी – जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
  74. जगद्गुरू – जगत् के गुरू
  75. व्योमकेश – आकाश रूपी बाल वाले
  76. महासेनजनक – कार्तिकेय के पिता
  77. चारुविक्रम – सुन्दर पराक्रम वाले
  78. रूद्र – भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
  79. भूतपति – भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
  80. स्थाणु – स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  81. अहिर्बुध्न्य – कुण्डलिनी को धारण करने वाले
  82. दिगम्बर – नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
  83. अष्टमूर्ति – आठ रूप वाले
  84. अनेकात्मा – अनेक रूप धारण करने वाले
  85. सात्त्विक – सत्व गुणधारी
  86. शुद्धविग्रह – शुद्धमूर्ति वाले
  87. शाश्वत – नित्य रहने वाले
  88. खण्डपरशु – टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  89. अज – जन्म रहित
  90. पाशविमोचन – बंधन से छुड़ाने वाले
  91. मृड – सुखस्वरूप वाले
  92. पशुपति – पशुओं के मालिक
  93. देव – स्वयं प्रकाश रूप
  94. महादेव – देवों के भी देव
  95. अव्यय – खर्च होने पर भी न घटने वाले
  96. हरि – विष्णुस्वरूप
  97. पूषदन्तभित् – पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  98. अव्यग्र – कभी भी व्यथित न होने वाले
  99. दक्षाध्वरहर – दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
  100. हर – पापों व तापों को हरने वाले
  101. भगनेत्रभिद् – भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  102. अव्यक्त – इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  103. सहस्राक्ष – अनंत आँख वाले
  104. सहस्रपाद – अनंत पैर वाले
  105. अपवर्गप्रद – कैवल्य मोक्ष देने वाले
  106. अनंत – देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
  107. तारक – सबको तारने वाला
  108. परमेश्वर – सबसे परे ईश्वर
महाशिवरात्रि व्रत पूजा-अर्चना कब करना चाहिए 
शास्त्रानुसार महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) की पूजा-अर्चना प्रदोषकाल में करना शुभ माना गया है। सूर्यास्त के 2 घंटे 24 मिनट कि अवधि को प्रदोष-काल कहा जाता है। इसी काल में महादेव शिवजी और माता पार्वतीजी  का विवाह सम्पन्न हुआ हुआ था। प्रदोष काल में भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते है। इसी कारण प्रदोषकाल में ही शिवजी की पूजा-अर्चना करना चाहिए।
कहा जाता है कि प्रदोष काल में ही महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) के दिन ही द्वादश (12) ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। यही नहीं स्त्रियां सामान्यतः इस काल में अवश्य ही सजती-सँवरती है। वस्तुतः यह परम्परा शायद इसी कारण आज भी प्रचलित है इस काल में सम्पूर्ण श्रृंगार करना अत्यंत ही शुभ माना जाता है ऐसा करने से दाम्पत्य जीवन सुखमय रहता है। गृह-क्लेश से छुटकारा मिलता है। तलाक जैसी घटनाओ से भी मुक्ति मिलती है।
महाशिवरात्रि व्रत विधि (Mahashivratri Vrat Method)
शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि व्रत (Mahashivratri Vrat) के दिन  प्रातः-काल नित्यक्रिया से निवृत्त होकर मस्तक पर  तिलक लगाना चाहिए । यदि घर में रुद्राक्ष की माला हो तो गले में रुद्राक्ष की माला धारण करें। इसके बाद नजदीक के  किसी शिव मंदिर में जाकर गौरी-शंकर की तथा  शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करना चाहिए। शिवरात्रि व्रत का संकल्प निम्न मन्त्र से लेना चाहिए —
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
महाशिवरात्रि का व्रत (Mahashivratri Vrat) भक्तो को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए।  इस दिन सामान्यतः लोग शिवलिंग पर बिल्व-पत्र, धतूरा तथा धतूरा पत्र  चढा़ते हैं। परन्तु किसी भी सूरत में गौरी-शंकर की पूजा-अर्चना करना नहीं भूलना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के घर के नजदीक कोई शिवालय ना हो तब मिट्टी से शिवलिंग बनाकर उसका पूजन करना चाहिए और यदि मिटटी भी उपलब्ध न हो तो अपने हाथ की मध्यमा उंगली से शिवलिंग बना लेना चाहिए और उसी के ऊपर दुधाभिषेक या जलाभिषेक करना चाहिए। इस दिन  कच्चे दूध से शिवलिंग को स्नान करना चाहिए, धूप-दीप से आराधना करना चाहिए तथा पूरा दिन उपवास रखना चाहिए। शिवलिंग की पूजा के समय “उँ नम: शिवाय” मंत्र  तथा महामृत्युंजय मन्त्र का जाप करना चाहिए। यदि सारी रात जागकर पूजन सम्भव ना हो तब प्रथम प्रहर की पूजा अवश्य करनी चाहिए। रात को जागरण करके शिव स्तुति का पाठ करना चाहिए या सुनना चाहिये।
जरूर पढ़े “शिवजी को कौन सा फूल चढाने से क्या फल मिलता है”
पुनः प्रदोष काल में या अर्धरात्रि में पूजन करके दूसरे दिन व्रत का पारण करना श्रेष्ठकर होता है पारण पूर्व यदि संभव हो तो तिल, जौ, बेलपत्र आदि से हवन करना भी श्रेष्ठकर होता है। यदि आप सामर्थ्यवान है या कुंडली में मारकेश की दशा चल रही हो या कोई अन्य प्रकार का दोष है तो  इस दिन प्रदोषकाल में स्नान आदि से निवृत होकर वैदिक मंत्रों से रुद्राभिषेक करना चाहिए।
महाशिवरात्रि के दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी मनोवांच्छित फल की प्राप्ति के लिए इच्छित विषय को आधृत करके पूजन तथा मंत्र का जाप करके महादेव शिवजी की कृपा से मनोनुकूल फल प्राप्त कर सकता है।
सर्वबाधा निवारण हेतु ( For Removing all Obstacles)
रुद्राभिषेक करवाना चाहिए।
रोग-दुःख निवारण हेतु ( For Get rid off disease)
महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना चाहिए :- “उँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम, ऊर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात”
व्यवसाय में सफलता हेतु (For Success in Business )
महाशिवरात्रि के दिन शुभ मुहुर्त में पारद के शिवलिंग की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करवाना चाहिए तथा पुनः प्रतिदिन पूजा पाठ करने से व्यवसाय में उन्नति होती है।
शत्रुओं पर विजय हेतु  (For Victory over Enemy)
महाशिवरात्रि के दिन अर्धरात्रि में  लिंगाष्टक या रुद्राष्टक का पाठ करना चाहिए। इसका पाठ करने से शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है। यदि कोई मुक़दमा चल रहा हो तो उस पर भी विजय प्राप्त करता है। कार्यस्थल में कोई परेशानी हो तो शीघ्र ही दूर हो जाता है।
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