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Retrograde Planets – जानें ! ग्रह क्यों और कैसे वक्री होते हैं ?
Astrology, Planet / By Dr. Deepak Sharma
Retrograde Planets – जानें ! ग्रह क्यों और कैसे वक्री होते हैं ? ज्योतिष में नव ग्रहों के आधार पर भविष्य कथन किया जाता है। इन ग्रहों के मार्गी और वक्री पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। वैदिक ज्योतिष में वक्री ग्रह क्यों वक्री होते है ? तथा जातक के ऊपर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा ? का अध्ययन करने के उपरांत भविष्य कथन का विधान है।
What is Retrograde Planets | क्या है वक्री ग्रह?
नक्षत्र मंडल के नेपथ्य में सभी ग्रह सामान्यतः पश्चिम से पूर्व ( West to East) की ओर गति करते हुए दिखाई देते हैं। किन्तु कभी-कभी कुछ काल के लिए ग्रह पूर्व से पश्चिम ( East to West ) अर्थात विपरीत दिशा में चलते हुए दिखाई पड़ते हैं जिसे वक्री कहते हैं। वस्तुतः सभी ग्रह एक ही दिशा में सूर्य के चक्कर लगाते हैं किन्तु पृथ्वी से देखने पर कुछ ग्रह कभी वक्री दिखाई पड़ते हैं।
Retrograde Planets | क्यों होते हैं ग्रह वक्री ?
आकाशीय मंडल में दो प्रकार के ग्रह हैं आतंरिक और बाह्य। अर्थात सूर्य और पृथिवी के मध्य आने वाले ग्रह आंतरिक ग्रह ( बुध, शुक्र )कहलाते हैं। सूर्य और पृथ्वी के मध्य जो ग्रह नहीं है वह वाह्य ग्रह ( मंगल, लघु ग्रह, वृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, यम) कहलाता है।
सर्वप्रथम आंतरिक ग्रह का उदाहरण लेते हैं – जैसे बुध की गति को देखें। सभी ग्रहों के साथ पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। सूर्य के चारों ओर बुध ग्रह 88 दिनों में एक चक्कर लगा लेता है। पृथिवी बुध की अपेक्षा ज्यादा दूरी पर है। पृथ्वी सूर्य से चारों ओर 365, 1/4 दिनों में एक चक्कर पूरा करती है, इस कारण बुध की कोणीय गति पृथ्वी से अधिक है।
आइये इस चित्र के माध्यम से समझते है की किस प्रकार से ग्रह वक्री होते हैं
इस चित्र में बुध ग्रह कैसे वक्री होता है दिखाया गया है। बुध की चाल को तीर के निशान से दिखाया गया है। भचक्र में तीर के निशान की दिशा में ग्रहों के भोगांश बढ़ते हैं। ग्रहों के भोगांश भू-केंद्रीय मापे जाते हैं।
मान लें कि पृथ्वी ( Earth) स्थिर है तथा बुध ( Mercury) जो सूर्य के सबसे समीप ग्रह है अपनी दिशा में तेज गति से चल रहा है। यहाँ पर पृथ्वी को स्थिर माना गया है। अब मान लेते हैं की की भचक्र में ग्रहों की गति को देखने वाले ( दर्शक )“P” अर्थात पृथ्वी के एक केंद्र बिंदु पर स्थित है। बुध A बिंदु पर है और भचक्र में A1 पर दिखाई दे रहा है जब बुध Bपर पहुंचता है तो यह बुध भचक्र में B1 पर दिखाई दे रहा है। उसी प्रकार जब बुध C पर पहुंचता है यह भचक्र में C1 पर दिखाई पड़ेगा।
यहां पर बुध ( Mercury) का भोगांश बढ़ रहा है अर्थात बुध की गति मार्गी है जब बुध D पर आ  जाता है तो बुध का  भोगांश D 1 पर दिखाई देगा। यहाँ पृथ्वी P से D, D1 स्पर्श रेखा है। D बिंदु पर बुध कुछ देर के लिए स्थिर दिखाई देखा क्योकि यहीं से बुध की वक्री गति प्रारम्भ होती है।
बुध जब D बिंदु से आगे बढ़ता है तो क्रमशः E & F बिंदु से गुजरेगा तब वह P से देखने पर भचक्र में क्रमशः E1 और F1 बिंदुओं पर दिखाई देगा और जब G बिन्दु पर पहुंचेगा तो G1 पर दिखाई देगा । चुकी E1 से G1 तक क्रमशः भोगांश कम हो रहा है अब बुध वक्री अर्थात विपरीत दिशा में गमन करता हुआ दिखाई पडेगा।  G1 पर बुध कुछ देर के लिए स्थिर दिखाई देगा और बाद में A &A1 पर मार्गी गति से दिखाई पडेगा। इसी प्रकार शुक्र ग्रह भी मार्गी और पुनः वक्री दिखाई पडेगा।
क्या वास्तव में ग्रह की गति वक्री होती है?
वास्तव में कोई ग्रह उल्टा नहीं चलता लेकिन परिभ्रमण पथ की स्थिति के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि वह उल्टी दिशा में जा रहा है।
बाह्य ग्रह कैसे वक्री दिखाई देंगे ?
आकाशीय मंडल में मंगल, वृहस्पति, शनि, वाह्य ग्रह है। इन ग्रह की गति पृध्वी से बहुत कम है। इस कारण उपर्युक्त ग्रह को स्थिर मानकर तथा पृथ्वी को गतिमान रखकर वाह्य ग्रहों मार्गी से कैसे वक्री होते जान सकते हैं।
कौन-कौन ग्रह वक्री नहीं होते हैं
सूर्य ( Sun) और चंद्रमा ( Moon) सदैव सामान्य गति से चलते हैं और कभी वक्री नहीं होते । वहीं दूसरी ओर राहु और केतु सदैव वक्री अवस्था में स्थित होते हैं। शेष ग्रह कभी वक्री और कभी मार्गी अवस्था में आते हैं। यह भी देखने में आता है कि आंतरिक ग्रह बुध एवं शुक्र जब पृथ्वी एवं सूर्य के बीच होते हैं तो वक्री दिखाई देते है।
वाह्य ग्रह मंगल, बृहस्पति एवं शनि वक्री तब होते हैं जब पृथिवी उस वाह्य ग्रह एवं सूर्य के मध्य में आती है। अर्थात दोनों स्थितियों में जब ग्रह पृथ्वी से समीप होता है तो ग्रह वक्री होता है।
 
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